प्रेम की अनिवार्यता

बहुत असंभव-से आविष्कार किए प्रेम ने और अंततः हमें मनुष्य बनाया लेकिन अस्वीकार की गहरी पीड़ा उस प्रेम के हर उपकार का ध्वंस करने पर तुली दिया जिसने सब कुछ न्यौछावर कर

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केवल दो गीत लिखे मैंने

केवल दो गीत लिखे मैंने इक गीत तुम्हारे मिलने का इक गीत तुम्हारे खोने का सड़कों-सड़कों, शहरों-शहरों नदियों-नदियों, लहरों-लहरों विश्वास किये जो टूट गए कितने ही साथी छूट गए पर्वत रोये-सागर रोये

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एक स्त्री पर कीजिए विश्वास

जब ढह रही हों आस्थाएँ जब भटक रहे हों रास्ता तो इस संसार में एक स्त्री पर कीजिए विश्वास वह बताएगी सबसे छिपाकर रखा गया अनुभव अपने अँधेरों में से निकालकर देगी

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सुपरिया के डार

अलसुबह नींद खुलते कैलेंडर में छुट्टी देख रहा था. सब कुछ बदला पर लाला रामस्वरूप का कैलेंडर आज भी मेरी आवश्यकता है, कमरे में ठीक सामने वाली दीवार पर उसका होना. आते–जाते

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क्या तुम रोई हो?

तुम देख लेते हो उसे वहाँ से निकल कर आते हुए अपने भीतर जहाँ जाकर सिसकती है अक्सर तुम पूछते हो : क्या हुआ? वह कहती है : कुछ नहीं तुम फिर पूछते

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एक ठहरा हुआ चाकू

अजीब बात थी, ख़ुद कमरे में होते हुए भी बाशी को कमरा ख़ाली लग रहा था। उसे काफी देर हो गई थी कमरे में आए–या शायद उतनी देर नहीं हुई थी जितनी

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भाग्य रेखा

कनाट सरकस के बाग में जहाँ नई दिल्ली की सब सड़कें मिलती हैं, जहाँ शाम को रसिक और दोपहर को बेरोजगार आ बैठते हैं, तीन आदमी, खड़ी धूप से बचने के लिए,

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गुलकी बन्नो

‘‘ऐ मर कलमुँहे !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन

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