शून्य

भीतर जो शून्य है उसका एक जबड़ा है जबड़े में मांस काट खाने के दाँत हैं; उनको खा जाएँगे, तुमको खा जाएँगे। भीतर का आदतन क्रोधी अभाव वह हमारा स्वभाव है, जबड़े

More

घर

जहाँ बिल्ली को खदेड़ता दिख जाएगा खरगोश वहीं अपना घर बनाऊँगा वहीं शीत वसंत लाऊँगा वहीं लगाऊँगा सेब, नारंगी संतरा वहीं कामधेनु पोसूँगा वहीं कवियों, बुलाऊँगा तुम्हें और काव्य पाठ कराऊँगा जहाँ

More

उत्तर

बहुत अधिक, बहुत अधिक तुम्‍हें याद करता मैं रहा; यह भी था कारण जो पत्र मैं लिख नहीं सका; लिख नहीं सका, बस। भावों का भार उन शब्‍दों से उठ नहीं सका,

More

एक टूटता हुआ घर

एक टूटते हुए घर की चीखें दूर-दूर तक सुनी जाती हैं कान दिए लोग सुनते हैं चेहरे पर कोफ्त लपेटे नींद की गोलियाँ निगलने पर भी वह टूटता हुआ घर सारी-सारी रात

More

कम से कम एक दरवाजा

चाहे नक्काशीदार एंटीक दरवाज़ा हो या लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बना उस पर खूबसूरत हैंडल जड़ा हो या लोहे का कुंडा वह दरवाज़ा  ऐसे घर का हो जहाँ माँ बाप

More

मुस्कुराती रही कामना

तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पना रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना चाँद घूँघट घटा का उठाता रहा द्वार घर का पवन खटखटाता रहा पास आते

More

हर तरफ धुआँ है

हर तरफ धुआँ है हर तरफ कुहासा है जो दाँतों और दलदलों का दलाल है वही देशभक्त है अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है – तटस्थता यहाँ कायरता के चेहरे पर

More

एक पारिवारिक प्रश्न

छोटे से आंगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के बिरवे दो पिता ने उगाया है बरगद छतनार मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूँ! मुट्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूं

More

कोई अधूरा पूरा नहीं होता

कोई अधूरा पूरा नहीं होता और एक नया शुरू होकर नया अधूरा छूट जाता शुरू से इतने सारे कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते परंतु इस असमाप्त – अधूरे से

More

धूप कोठरी के आईने में खड़ी

धूप कोठरी के आइने में खड़ी हँस रही है पारदर्शी धूप के पर्दे मुस्कराते मौन आँगन में मोम-सा पीला बहुत कोमल नभ एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को बहुत नन्हा फूल उड़ गई

More