तुमसे अलग हो कर

तुमसे अलग होकर लगता है अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं, और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में गिरता जा रहा हूँ। अब कहीं कोई यात्रा नहीं है, न अर्थमय, न

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मुसलमान

कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले वे व्याधि थे ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे वे मुसलमान थे उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे

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कविता ही दुख की बोली है

मुझको तब भी यह लगता था कविता ही दुख की बोली है काग़ज़ की नावों के जैसे यद्यपि छोटे-छोटे सुख थे, दुख का भवसागर अपार था लेकिन थी एक जगह घर में

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ट्राम में एक याद

चेतना पारीक कैसी हो ? पहले जैसी हो ? कुछ-कुछ खुश कुछ-कुछ उदास कभी देखती तारे कभी देखती घास चेतना पारीक, कैसी दिखती हो ? अब भी कविता लिखती हो ? तुम्हें मेरी याद न होगी

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कुछ बातें

आत्मग्लानि का कोई रंग नहीं होता बेचैनी की कोई भाषा नहीं दुख किसी कैलेंडर में दर्ज नहीं होते सुख को सहेजना धूप में स्वेटर सुखाना है मर्यादा की कोई सीमा नहीं होती

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काव्य गुरु

वे कहते हैं : प्रेम-कविताएँ लिखने के लिए प्रेम-कविताएँ पढ़ो वे यह नहीं कहते : प्रेम करो वे कहते हैं : फूलों तक जाने के लिए ख़ुशबू और रंग ख़रीदो वे यह

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मुझे हल कीजिए

मैं एक समस्या हूँ मुझे हल कीजिए उड़ने की चाह हूँ भटक गई राह हूँ निकल गई आह हूँ हिम्मत की थाह हूँ दुखती हुई रग हूँ थका हुआ पग हूँ ठहर

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मंटो की पाँच लघु कथाएँ

घाटे का सौदा दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक चुनी और बयालीस रुपए देकर उसे ख़रीद लिया. रात गुज़ार कर एक दोस्त ने उस लड़की से पूछा,‘‘तुम्हारा नाम क्या

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कुछ सूचनाएँ

सबसे अधिक हत्याएँ समन्वयवादियों ने की दार्शनिकों ने सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा भीड़ ने कल बहुत पीटा उस आदमी को जिस का मुख ईसा से मिलता था वह कोई और महीना था

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