लौटना

तुमने कहा जाती हूँ और तुमने सोचा कि कवि-केदार की तरह मैं कहूँगा जाओ लेकिन मेरी लोक-भाषा के पास अपने बिंब थे मेरी भाषा में जब भी कोई जाता था तो ‘आता

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मातृभाषा की मौत

माँ के मुँह में ही मातृभाषा को क़ैद कर दिया गया और बच्चे उसकी रिहाई की माँग करते-करते बड़े हो गए। मातृभाषा ख़ुद नहीं मरी थी उसे मारा गया था पर, माँ

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चंदू, मैंने सपना देखा

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में

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किस अज्ञात इशारे पर

यह एक नया दिन है— ख़ून में नहाई सदियों के बाद—यह मौन अट्टहास। न्याय की आशा में बाँधे हुए तुम्हें—मैं ताक रहा हूँ बूँद-बूँद टूटते आकाश में अँधेरा चिड़ियों की आँखें निचोड़

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अपरिचित

कोहरे की वजह से खिड़कियों के शीशे धुँधले पड़ गये थे। गाड़ी चालीस की रफ़्तार से सुनसान अँधेरे को चीरती चली जा रही थी। खिड़की से सिर सटाकर भी बाहर कुछ दिखाई

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वे तुम्हें मज़बूर करेंगे

वे तुम्हें मज़बूर करेंगे कि तुम्हारा भी एक रूप हो निश्चित कि तुम्हारा भी हो एक दावा कि हो तुम्हारा भी एक वादा कि तुम्हारा भी एक स्टैण्ड हो कि तुम्हारी भी

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हे भले आदमियों

डबाडबा गई है तारों-भरी शरद से पहले की यह अँधेरी नम रात । उतर रही है नींद सपनों के पंख फैलाए छोटे-मोटे ह्ज़ार दुखों से जर्जर पंख फैलाए उतर रही है नींद

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धूप कोठरी के आईने में खड़ी

धूप कोठरी के आइने में खड़ी हँस रही है पारदर्शी धूप के पर्दे मुस्कराते मौन आँगन में मोम-सा पीला बहुत कोमल नभ एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को बहुत नन्हा फूल उड़ गई

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