उसने मेरे बेगानेपन को ही छेड़ दिया घनी उमस में कभी न उसने पंखा हाँका है लसिया गए भात को देसी घी से छौंका है दूध मुँहे पाड़े को माँ से दूर
उसने मेरे बेगानेपन को ही छेड़ दिया घनी उमस में कभी न उसने पंखा हाँका है लसिया गए भात को देसी घी से छौंका है दूध मुँहे पाड़े को माँ से दूर
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