काफ़्का के प्राहा में

एक उपस्थिति से कहीं ज़्यादा उपस्थित हो सकती है कभी-कभी उसकी अनुपस्थिति एक वर्तमान से ज़्यादा जानदार और शानदार हो सकता है उसका अतीत एक शहर की व्यस्त दैनन्दिनी से अधिक पठनीय

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मन बहुत सोचता है

मन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए? शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले, पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव

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सवाल ज्यादा हैं

पुराने शहर उड़ना चाहते हैं लेकिन पंख उनके डूबते हैं अक्सर खून के कीचड़ में! मैं अभी भी उनके चौराहों पर कभी भाषण देता हूँ जैसा कि मेरा काम रहा वर्षों से

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