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ग़ज़ल

फूलों ने दिए जख़्म तो काँटों से गिला क्या

फूलों ने दिए जख़्म तो काँटों से गिला क्या क्या करना था अपनों से सुलूक और किया क्या जब हाथ में शीशा था न सागर था न मीना गर दिल नहीं टूटा

फूलों ने दिए जख़्म तो काँटों से गिला क्या

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