देह के बच्चन, मन के बच्चन, समाज के बच्चन, सभ्यता और संस्कृति के बच्चन, सरकार के बच्चन, जनता के बच्चन और काव्य के बच्चन, ये सब बच्चन मुझे एक जैसे ही लगे
एक दिन एक कवि ने शिकायत की कि ‘आप हिंदी के लेखकों को ही क्यों ठोकते हैं? अन्य भाषाओं वाले पढ़ते होंगे, तो क्या सोचते होंगे?’ ‘न ठोकता, तो तुम क्या यह
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