परिणति

उस दिन भी ऐसी ही रात थी। ऐसी ही चांदनी थी। उस दिन भी ऐसे ही अकस्मात्, हम-तुम मिल गए थे। उस दिन भी इसी पार्क की इसी बेंच पर बैठ कर,

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उँगलियों के पोरों पर दिन गिनती

उँगलियों पर गिन रही है दिन खाँटी घरेलू औरत सोनू और मुनिया पूछते हैं ‘क्या मिलाती रहती हो मां उँगलियों की पोरों पर’ वह कहती है ‘तुम्हारे मामा की शादी का दिन

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उड़ानें

कवि मरते हैं जैसे पक्षी मरते हैं गोधूलि में ओझल होते हुए ! सिर्फ़ उड़ानें बची रह जाती हैं दुनिया में आते ही क्यों हैं जहाँ इन्तज़ार बहुत और साथ कम स्त्रियाँ जब

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एकता सिरीकर की कविताएँ

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1. प्रेम लिपि तुम्हारी दैहिक शुचिता को दैविकता मानकर; क्षण-क्षण ठगा जाना, स्वीकार किया मैंने! मैं हारती चली गई ; तुम जीतते गए हर बार! सर्वस्व अर्पण, समर्पण; मेरे प्रेम की लिपि

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समझदारों का गीत

हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं हम समझते हैं खून का मतलब पैसे की कीमत हम समझते हैं क्या है

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कुमार विजय गुप्त की कविताएँ

1. झूठ-मूठ हरेक झूठ की एक मूठ होती है जिसे मजबूती से पकड़े रहता है झूठ जिधर भी जाता साथ लिए चलता है जैसे हत्यारा हर वक्त साथ रखता है अपना प्रिय हथियार

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विनय सौरभ की कविताएँ

1. पिता की कमीज़ पिता की कमीज़ खूंटी पर टंगी है बरसों से पसीने से भीगी और पहाड़ों की तरफ से हवा लगातार कमरे में आ रही है पिता बरसों से इस

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आँकड़ों की बीमारी

एक बार मुझे आँकड़ों की उल्टियाँ होने लगीं गिनते गिनते जब संख्या करोड़ों को पार करने लगी मैं बेहोश हो गया होश आया तो मैं अस्पताल में था खून चढ़ाया जा रहा

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राजनीतिज्ञ

विचलन तो दूर की बात है डर की एक लौ भी नहीं छूती उन्हें उन्होंने पढ़ रखी है गीता वे मार सकते हैं स्वजनों को वे जानते हैं तुम्हें कि तुम लाचार

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