उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!

बाबा! मुझे उतनी दूर मत ब्याहना जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हें मत ब्याहना उस देश में जहाँ आदमी से ज़्यादा ईश्वर बसते हों जंगल नदी पहाड़

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पिता की तस्वीर

पिता की छोटी-छोटी बहुत-सी तस्वीरें पूरे घर में बिखरी हैं उनकी आँखों में कोई पारदर्शी चीज़ साफ़ चमकती है वह अच्छाई है या साहस तस्वीर में पिता खाँसते नहीं व्याकुल नहीं होते

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मारे जाएँगे

जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएँगे कठघरे में खड़े कर दिये जाएँगे जो विरोध में बोलेंगे जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएँगे बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज

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धूमिल की अंतिम कविता

“शब्द किस तरह कविता बनते हैं इसे देखो अक्षरों के बीच गिरे हुए आदमी को पढ़ो क्या तुमने सुना की यह लोहे की आवाज है या मिट्टी में गिरे हुए खून का

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धीरे धीरे

इसी तरह धीरे-धीरे ख़्वाहिशें ख़त्म होती हैं इसी तरह धीरे-धीरे मरता है आदमी इसी तरह धीरे-धीरे आँखों से सपने सपनों से रंग ख़त्म होते हैं रंगों से ख़त्म होती है दुनिया सफ़ेद

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इह मेरा गीत

इह मेरा गीत किसे ना गाणा इह मेरा गीत मैं आपे गा के भलके ही मर जाणा इह मेरा गीत किसे ना गाना । इह मेरा गीत धरत तों मैला सूरज जेड

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एकांत के पथिक

इन दिनों जब समय इतना धीमा है कि चीते की चाल घोंघे की मालूम हो मैं हमारे बीच उन चंद पलों की तेजी को अपनी सबसे ज्यादा तेज गति साबित करना चाहता

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रोटी और संसद

एक आदमी रोटी बेलता है एक आदमी रोटी खाता है एक तीसरा आदमी भी है जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है मैं पूछता

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तटस्थ के प्रति

चैन की बाँसुरी बजाइये आप शहर जलता है और गाइये आप हैं तटस्थ या कि आप नीरो हैं असली सूरत ज़रा दिखाइये आप

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ऊँचाई है कि

मैं वह ऊँचा नहीं जो मात्र ऊँचाई पर होता है कवि हूँ और पतन के अंतिम बिंदु तक पीछा करता हूँ हर ऊँचाई पर दबी दिखती है मुझे ऊँचाई की पूँछ लगता

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