पुरखों का कहन

उनकी कविताओं में शब्द नहीं बोलते उनके बनाए चित्रों में रंग नहीं बहकते उनकी कहानियों में तख़्त-ओ-ताज के लिए ख़ून नहीं बहता फिर भी वे कविता करते हैं चित्र बनाते हैं कहानियाँ

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कथा देश की

ढंगों और दंगों के इस महादेश में ढंग के नाम पर दंगे ही रह गये हैं। और दंगों के नाम पर लाल खून, जो जमने पर काला पड़ जाता है। यह हादसा

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मीर

मीर पर बातें करो तो वे बातें भी उतनी ही अच्छी लगती हैं जितने मीर और तुम्हारा वह कहना सब दीवानगी की सादगी में दिल-दिल करना दुहराना दिल के बारे में ज़ोर

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बड़ी हो रही है लड़की

जब वह कुछ कहती है उसकी आवाज़ में एक कोई चीज़ मुझे एकाएक औरत की आवाज़ लगती है जो अपमान बड़े होने पर सहेगी वह बड़ी होगी डरी और दुबली रहेगी और

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एक नया अनुभव

मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक कविता लिखना चाहता हूँ। चिड़िया नें मुझ से पूछा, ‘तुम्हारे शब्दों में मेरे परों की रंगीनी है?’ मैंने कहा, ‘नहीं’। ‘तुम्हारे शब्दों में मेरे

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निरापद कोई नहीं है

ना निरापद कोई नहीं है न तुम, न मैं, न वे न वे, न मैं, न तुम सबके पीछे बंधी है दुम आसक्ति की! आसक्ति के आनन्द का छंद ऐसा ही है

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उस औरत की बगल में लेटकर

मैंने पहली बार महसूस किया है कि नंगापन अन्धा होने के खिलाफ़ एक सख्त कार्यवाही है उस औरत की बगल में लेटकर मुझे लगा कि नफ़रत और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार साबित हो

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कविता और लाठी

तुम मुझसे हाले-दिल न पूछो ऐ दोस्त! तुम मुझसे सीधे-सीधे तबियत की बात कहो। और तबियत तो इस समय ये कह रही है कि मौत के मुँह में लाठी ढकेल दूँ, या

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हँसती रहने देना

जब आवे दिन तब देह बुझे या टूटे इन आँखों को हँसती रहने देना ! हाथों ने बहुत अनर्थ किये पग ठौर-कुठौर चले मन के आगे भी खोटे लक्ष्य रहे वाणी ने

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सतपुड़ा के घने जंगल

सतपुड़ा के घने जंगल। नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल। झाड ऊँचे और नीचे, चुप खड़े हैं आँख मीचे, घास चुप है, कास चुप है मूक शाल, पलाश चुप है।

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