कम से कम एक दरवाजा

चाहे नक्काशीदार एंटीक दरवाज़ा हो या लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बना उस पर खूबसूरत हैंडल जड़ा हो या लोहे का कुंडा वह दरवाज़ा  ऐसे घर का हो जहाँ माँ बाप

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इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले

इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले मौत की राह नहीं देखते मरने वाले आख़िरी वक़्त भी पूरा न किया वादा-ए-वस्ल आप आते ही रहे मर गये मरने वाले उठ्ठे और

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दुआ करो

दुआ करो कि ये पौधा सदा हरा ही लगे उदासियों से भी चेहरा खिला-खिला ही लगे ये चाँद तारों का आँचल उसी का हिस्सा है कोई जो दूसरा ओढे़ तो दूसरा ही

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मुस्कुराती रही कामना

तुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पना रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना चाँद घूँघट घटा का उठाता रहा द्वार घर का पवन खटखटाता रहा पास आते

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मैं कहीं और भी होता हूँ

मैं कहीं और भी होता हूँ जब कविता लिखता हूँ कुछ भी करते हुए कहीं और भी होना धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है हर वक्त बस वहीं होना जहाँ कुछ कर

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जवाब हवा में उड़ रहा है

कितने रास्ते तय करे आदमी कि तुम उसे इनसान कह सको ? कितने समंदर पार करे एक सफेद कबूतर कि वह रेत पर सो सके ? हाँ, कितने गोले दागे तोप कि

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कई बार

एक जीना जग जाहिर एक जीना चुपचाप दो-दो प्रकार से जीना पड़ता है एक जीवन कई बार अकस्‍मात एक दिन खत्‍म होने से पहले अँजुली भर पानी में सिकुड़ते आकाश की तड़प

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हर तरफ धुआँ है

हर तरफ धुआँ है हर तरफ कुहासा है जो दाँतों और दलदलों का दलाल है वही देशभक्त है अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है – तटस्थता यहाँ कायरता के चेहरे पर

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एक पारिवारिक प्रश्न

छोटे से आंगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के बिरवे दो पिता ने उगाया है बरगद छतनार मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूँ! मुट्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूं

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कोई अधूरा पूरा नहीं होता

कोई अधूरा पूरा नहीं होता और एक नया शुरू होकर नया अधूरा छूट जाता शुरू से इतने सारे कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते परंतु इस असमाप्त – अधूरे से

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