नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ मुझे ऊँचाइयों का वह अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा
चाहे नक्काशीदार एंटीक दरवाज़ा हो या लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बना उस पर खूबसूरत हैंडल जड़ा हो या लोहे का कुंडा वह दरवाज़ा ऐसे घर का हो जहाँ माँ बाप
Moreइश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले मौत की राह नहीं देखते मरने वाले आख़िरी वक़्त भी पूरा न किया वादा-ए-वस्ल आप आते ही रहे मर गये मरने वाले उठ्ठे और
Moreतुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पना रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना चाँद घूँघट घटा का उठाता रहा द्वार घर का पवन खटखटाता रहा पास आते
Moreमैं कहीं और भी होता हूँ जब कविता लिखता हूँ कुछ भी करते हुए कहीं और भी होना धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है हर वक्त बस वहीं होना जहाँ कुछ कर
Moreकितने रास्ते तय करे आदमी कि तुम उसे इनसान कह सको ? कितने समंदर पार करे एक सफेद कबूतर कि वह रेत पर सो सके ? हाँ, कितने गोले दागे तोप कि
Moreहर तरफ धुआँ है हर तरफ कुहासा है जो दाँतों और दलदलों का दलाल है वही देशभक्त है अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है – तटस्थता यहाँ कायरता के चेहरे पर
Moreछोटे से आंगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के बिरवे दो पिता ने उगाया है बरगद छतनार मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूँ! मुट्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूं
Moreकोई अधूरा पूरा नहीं होता और एक नया शुरू होकर नया अधूरा छूट जाता शुरू से इतने सारे कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते परंतु इस असमाप्त – अधूरे से
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